Thursday, November 25, 2010

इन टेपों में वीर सांघवी ने सोनिया गांधी की चाभी अपने पास होने का दावा कर दिया

आलोक तोमर: वीर सांघवी के नीरा राडिया से बातचीत के कई और टेप जारी : देश के बड़े-बड़े मुद्दों पर ये ऐसे बात करते हैं जैसे सब कुछ इनके इशारे पर होता है : दलाली के टेपों ने मीडिया जगत में मचाई खलबली : वीर सांघवी मुंबई के रईस परिवार के बेटे हैं और पत्रकारिता में 22 साल की उम्र में संपादक बन गए थे। अब पचास से ज्यादा के हैं लेकिन रंगबाजी और कभी टीवी चैनलों में से किसी के लिए तो कभी शुद्ध दलाली वाले कॉलमों के लिए दुनिया के कोने-कोने में घूमते रहते हैं। इसके बावजूद जयपुर में हों या गोवा में, महादलाल नीरा राडिया के लिए मुकेश अंबानी की सेवा करने का वक्त निकाल लेते हैं। हमारे पास वीर सांघवी जैसे सफल पत्रकार के दलाली से जुड़े आठ टेप हैं। एक-एक कर के आपको पढ़वाएंगे भी और सुनवाएंगे भी। देखते जाइए कि हमारी पत्रकारिता के महानायकों के असली चेहरे कितने बदसूरत हैं। लीजिए आठ में से कुछ टेपों में हुई बातचीत के ट्रांसक्रिप्ट को पढ़िए और फिर सभी आठों टेपों को एक-एक करके सुनते जाइए-

वीर सांघवी- हाय नीरा

नीरा राडिया- हाय वीर, तुम कहां हो, दिल्ली में या कहीं और?

वीर- जयपुर में हूं, शाम को आ रहा हूं।

नीरा- ओके। मैं कुछ कहना चाह रही थी। असल में मैं तमिलनाडु वाले दोस्तों से बात कर रही थी। वो जरूरी भी था। मुझे नहीं मालूम कि तुम कांग्रेस में किसी से बात करने की हालत में हो या नहीं लेकिन मैंने अभी कनिमोझी से बात की। मैं उससे मिली थी।

वीर- अच्छा?

नीरा- आज शाम को या रात को हम लोग बैठेंगे तब मैं बताऊंगी। असल में समस्याएं बहुत है।

वीर- मुझे आज सोनिया से मिलना था। मैं यहां जयपुर में अटक गया हूं। अब कल ही मुलाकात होगी। मैं जब चाहता हूं, मिल लेता हूं। वैसे भी राहुल से तो चाहे जब मुलाकात होती रहती है। तुम मुझे बताओ, क्या करना है?

नीरा- मैं क्या बताऊं? कांग्रेस वाले समझ ही नहीं रहे है। वे गलत आदमी यानी दयानिधि मारन से बात कर रहे हैं। मारन गलत आदमी है। करुणानिधि ने भी उसे बातचीत करने का अधिकार नहीं दिया है मगर तुम जानते हो कि यहां तो जंगल राज है और आंधी चल रही है।

वीर- जब मारन को सब लोग नफरत करते हैं तो वो बीच में कहां से आ गया?

नीरा- वो कुछ है ही नहीं, ये मुझे पता है, तुम्हे पता है मगर कांग्रेस वालों की समझ में नहीं आती। प्रधानमंत्री भी मारन से बात कर रहे हैं और डीएमके को कमाई वाले मंत्रालय देने का वायदा कर रहे हैं मगर मारन खुद अपने लिए टेलीकॉम चाहता है। आफत यह है कि कनि का भाई अलागिरि भी चुनाव जीता हैं और भारी नेता है।

वीर- मैं जानता हूं। वो स्टालिन से ज्यादा अक्ल रखता है।

नीरा- अब मारन कांग्रेस से कह चुका है कि अलागिरि को राज्य मंत्री बना दो, स्वतंत्र प्रभार दे दो और बाकी मुझ पर छोड़ दो।

वीर- इतनी हिम्मत आ गई दयानिधि में?

नीरा- दयानिधि तो टी आर बालू को और राजा को भी गाली देता है। करुणानिधि की बेटी को सिर्फ राज्यमंत्री बनवाना चाहता है जबकि अलागिरि आधे से ज्यादा तमिलनाडु काबू में रखता है और करुणानिधि यह बात जानते हैं। वह मारन से पद और कद में दोनों में बड़ा है। उसने तो पिता से कह दिया है कि अगर आप मारन को मंत्री बनाएंगे तो मैं मंत्री नहीं बनूंगा।

वीर- अच्छा, ये तो बड़ा मजेदार है। क्या कांग्रेस इसे समझ रही है?

नीरा- वहीं तो समझाना है। कांग्रेस वालों को कनि के जरिए सीधे करुणानिधि से बात करनी चाहिए।

वीर- सोनिया ने करुणानिधि से कल बात की थी।

नीरा- नहीं, तुम्हारी जानकारी गलत है। मनमोहन ने बात की थी और कनि वहां बैठी हुई थी इसलिए सारी बात को अनुवाद कर के सुना रही थी। यह मामला अपने को सुलझाना पड़ेगा। गुलाम नबी आजाद को कनिमोझी से बात करने के लिए कहो।

वीर- ठीक हैं, मैं इंतजाम करता हूं।

नीरा- मैं मजाक नहीं कर रही। सिर्फ यही एक तरीका है और कनि ही कांग्रेस वालों को करुणानिधि के पास ले जा सकती है।

वीर- मै अभी सोनिया को इसमें नहीं डालूंगा। उसकी समझ मेंं ज्यादा आता नहीं है। मैं पहले अहमद पटेल से बात कर के देखता हूं। पटेल समझदार भी है और सोनिया उसकी सुनती भी है।

नीरा- कनि को पहले पकड़ना पड़ेगा। करुणानिधि को तीन मंत्रिमंडल सीटों से कोई दिक्कत नहीं हैं लेकिन कांग्रेस ने कबाड़ा किया हुआ है। पता नहीं क्यों कांग्रेस मारन को लगातार आगे बढ़ाती जा रही है। अगर मारन को बाहर रखा जाता तो राजा और बालू तक बात आ कर टिक जाती और हो सकता है कि राजा, अलागिर और कनि तीनों राज्यमंत्री पर राज हो जाते मगर मारन वाला चक्कर तो कांग्रेस ने डाला।

वीर- और मैं सोच रहा था कि डीएमके ने वाकर्इ्र मारन को नियुक्त किया है।

नीरा- नहीं नहीं नहीं नहीं और नहीं...। डीएमके ने अपनी लिस्ट में पांच मंत्रालय और नाम भेजे थे और मारन का नाम भी उसमें था। उन्हे उम्मीद थी कि कांग्रेस राजा के बारे में उनसे बात करेगी। आखिरकार बात तीन मंत्रालयों पर आ कर टिक जाती मगर बात ही गलत आदमी से हो रही है।

वीर- मैं समझ गया। मैं अहमद से बात करूंगा।

नीरा- कनि से बात करना ज्यादा आसान होता। कनि बेटी हैं और उसके सामने कोई भी बात की जा सकती है। कांग्रेस को कहना पड़ेगा कि उन्हें मारन नहीं चाहिए। ये इंतजाम हर कीमत पर तुम्हे करना पड़ेगा।

वीर- ठीक है, अभी से लगता हूं इसमें। अहमद से, राहुल से या सीधे सोनिया से कुछ न कुछ तो रास्ता निकालूंगा। वैसे कनि अभी कहां है?

नीरा- साउथ एवेन्यू वाले अपने घर पर।

वीर- कोई मोबाइल भी तो होगा?

नीरा- मैं अभी उससे मिल के आ रही हूं। वहां कुछ तमिलनाडु कांग्रेस के लोग भी थे जो बाहर बैठे हुए थे। वीर तुम तो गुलाम को पकड़ो, वही काम का आदमी है।

(इसके बाद सुपर दलाल नीरा और उसके एजेंट वीर सांघवी की एक और बातचीत)

वीर- नीरा तुम अभी बात कर सकती हो?

नीरा- बोलो ना, तुम्हारे लिए जान हाजिर है।

वीर- मारन सोनिया से नहीं मिला।

नीरा- मुझे पता है। मगर यह बात सबको पता नहीं लग रही।

वीर- मैंने इंतजाम कर लिया है कि मारन सोनिया से कभी नहीं मिल पाए। वो गया था मगर उसे साफ कह दिया गया कि तुम्हे हम डीएमके का प्रवक्ता नहीं मानते। मेरे पास भी उसका फोन आया था और गुलाम का भी फोन आया था। गुलाम परेशान था कि मारन हर आधे घंटे में उसे फोन कर रहा है। जहां तक अपन लोगों का सवाल है तो दो बिबियां हैं, एक भाई है, एक बहन है, एक भतीजा है और इससे चीजे और ज्यादा उलझ रही है। हमने अपना ऑफर दे दिया। अब करुणानिधि को जवाब देना है कि वे सोनिया गांधी से सीधे बात करना चाहते हैं या नहीं। अभी तक उनकी बात मनमोहन सिंह से हुई हैं, सोनिया की चाभी तो मेरे पास है। मैं बात करा सकता हूं लेकिन अब मैं पीछे नहीं पड़ूंगा। अब मारन को भी मैंने कह दिया है कि आपको हमारे प्रस्ताव का जवाब देना है।

नीरा- तुम्हारी गुलाम नबी से बात हुई?

वीर- मैंने अहमद से बात की। फैसला गुलाम नबी को नहीं, अहमद पटेल को करना है। अहमद ने मुझे बताया कि गुलाम मारन से बात कर रहा है लेकिन गुलाम भी हमारा प्रवक्ता नहीं हैं। मारन को भी अहमद ज्यादा भाव नहीं दे रहा है। ये डीएमके वाले लोग पागल हो गए हैं। पांच बड़े मंत्रालय मांग रहे हैं। अब करुणानिधि हमसे बात करें। कनि हमसे आ कर मिले, अपने पिता से जो भी बात करे या हमारी बात कराए मगर मैं मारन से बात नहीं करूंगा और उसको मैंने कह दिया है कि गुलाम को भी परेशान मत करो। मारन चेन्नई चला गया है और वहां से फोन करेगा। चेन्नई भी इसलिए गया है कि मैंने उससे कहा है कि अब हम करुणानिधि से सीधे बात करेंगे। हम बुङ्ढे की इज्जत करते हैं, मारन तो फालतू आदमी है।

नीरा- यह बात मैं सबको बताती हूं।

वीर- मैंने एम के नारायणन से भी कह दिया है कि वे प्रधानमंत्री को ठीक से समझा दे। सोनिया से बात मैं कर लूंगा।

बातचीत आप यहां सुन सकते हैं, आडियो प्लेयर पर क्लिक करें और साउंड को फुल कर लें-

लेखक आलोक तोमर देश के जाने-माने पत्रकार हैं. इन दिनों सीएनईबी न्यूज चैनल से जुड़े हुए हैं और डेटलाइन इंडिया न्यूज एजेंसी के संपादक हैं

इस टेप को सुनने के बाद तो हर कोई कहेगा- प्रभु चावला दलाल है

नीरा राडिया से प्रभु चावला की बातचीत का टेप जारी : अब किसी को संदेह नहीं रह जाएगा कि प्रभु चावला दलाल है. मीडिया के लोग तो पहले से जानते थे लेकिन देश की जानता अब जानेगी. बड़े लोग फोन पर कैसी कैसी बातें करते हैं, देश-संविधान-समाज को लेकर कितनी गंदी-गंदी बातें करते हैं, ये सब जानना हो तो नीचे दिए गए आडियो प्लेयर पर क्लिक करके उसे सुनें. हालांकि उस बातचीत के काफी अंशों को हमने ट्रांसक्रिप्ट कर दिया है, सो उसे पढ़ भी सकते हैं लेकिन आपको यकीन तभी आ सकेगा जब आप आडियो सुनेंगे, नीरा-प्रभु की बातचीत सुनेंगे. पूरा देश जानता था कि प्रभु चावला दलाल हैं, उन्हें प्राथमिक कक्षा के बराबर अंग्रेजी आती है, पत्रकारिता के नाम पर वे पचास धंधे करते हैं मगर इंडिया टुडे के चेयरमैन अरुण पुरी को यह कहानी देर मे समझ में आई. सुपर दलाल नीरा राडिया और सफल दलाल प्रभु चावला के बीच बातचीत का जो ये एक टेप हमारे पास है वो अब कई जगहों पर घूम-टहल रहा है. इस टेप के माध्यम से आप प्रभु चावला की घटिया अंग्रेजी को सुनने का लाभ प्राप्त कर सकते हैं. पूरी कहानी और पूरी बातचीत पेश है.

छोटा भाई बड़ा हरामी है : प्रभु चावला

नीरा- कुछ खास बात नहीं, मैं तो तुम्हारे विचार जानना चाहती थी क्योंकि तुम काफी समझदार आदमी हो।

प्रभु चावला- हैं हैं हैं ऐसा तो कुछ नहीं, बस लोगों को जानता हूं, दोस्ती निभाता हूं और काम चलाता हूं।

नीरा- अभी तो मैं जानना चाहती हूं कि अंबानी बंधुओं के बीच झगड़े में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया और देश के हित से ऊपर दो भाइयों का हित रखा इस पर तुम्हारी क्या राय है? तुम क्या सोचते हो?

प्रभु- जब ये दो भाई किसी चीज में शामिल हो तो देश तो अपने आप ही शामिल हो जाता है। समस्या यह है कि दोनों भाई आपस में बात नहीं करते और कोई ऐसा नहीं है जो उनमें बात करा सके। मैंने भी कोशिश की थी मगर कुछ हुआ नहीं। कभी अनिल पकड़ में नहीं आता तो कभी मुकेश लापता हो जाते। वैसे गलती मुकेश की ज्यादा है।

नीरा- मेरी आज ही सुबह मुकेश से बात हुई थी और वह कह रहा था कि अनिल को लगता है कि मीडिया खरीद कर और दैनिक भास्कर या जागरण या बिजनेस स्टैंडर्ड में लेख छपवा कर कंपनी चला लेगा तो मुझे अफसोस होता है।

प्रभु- असल में मुकेश अपनी बीबी के कहने पर चलता है। अनिल से मेरी अच्छी दोस्ती है और उसकी बीबी कहीं टांग नहीं अड़ाती। अनिल तो राजनीति मीडिया नेता सबका इस्तेमाल कर लेता है और ये जो छोटा वाला है ना, वो ज्यादा हरामी है मगर हरामी बनना पड़ता है। मुकेश कहीं बाहर गए थे, वापस आ गए क्या?

नीरा- वो तो एक हफ्ते से भारत में ही हैं और दिल्ली में ही हैं। कभी कभी शाम को बॉम्बे चले जाते हैं। तुम्हारी बात नहीं हो पा रही?

प्रभु- मैं दो तीन बार बॉम्बे गया। मुकेश ने मुझे खाने पर बुलाया था मगर अचानक गायब हो गया। कल भी बॉम्बे जा रहा हूं। कोशिश करूंगा। मैं तो दोनों का भला चाहता हूं। मुकेश की दिक्कत यह है कि धीरूभाई ने जो चमचे पाले थे वे अब किसी काम के नहीं रहे। जमाना बदल गया है मगर मुकेश ने अपने लोग नहीं बदले।

नीरा- मुकेश को तो तुम्हारे जैसे लोग चाहिए।

प्रभु- मैं तो सेवा करने को हमेशा तैयार हूं मगर मुकेश पूरा विश्वास किसी पर नहीं करता। मैंने दो तीन एसएमएस डाले उनका भी जवाब नहीं आया। मैंने तो उसे यह बताना चाहा था कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला उसके खिलाफ आ रहा है मगर वो तो इतना घमंडी है कि मैं क्या कहूं। अब भुगतेगा। इस देश में सब कुछ फिक्स होता है और सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट फिक्स करना कोई कठिन काम नहीं है। अनिल घूमता ज्यादा है, पैसे खर्च कम करता है। मुकेश तो धीरूभाई के जमाने से आगे बढ़ना ही नहीं चाहता। तुम समझ रही हो ना, मैं क्या कह रहा हूं? बेचारे मुकेश को तो सही जानकारी तक नहीं मिल पाती। मुझे पता है कि मुकेश सुप्रीम कोर्ट के लिए क्या कर रहा था और जो कर रहा था वो गलत कर रहा था। सबको पता था। आज कल तो सब फिक्स होता है। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इसे खत्म कर दिया न।

नीरा- अभी तो सुप्रीम कोर्ट का फाइनलाइज नहीं हुआ है।

प्रभु- अब तो और बड़ी गड़बड़ होने वाली है। प्राइम मिनिस्टर मुरली देवड़ा के पीछे पड़े हैं। दुनिया में गैस के दाम बढ़ने वाले हैं। अगर भारत सरकार अपनी ही गैस नहीं खरीद सकती तो उसे अदालत जाना ही पड़ेगा। देश का हित पहले है, देश का नुकसान नहीं होना चाहिए।

नीरा- यही तो मुकेश ने अनिल से कहा कि तेरा जितना बनता है, तू ले ले, एनटीपीसी अगर नहीं लेता तो वो भी तू ले ले मगर फैसला तो सरकार को करना है। 328 पेज का एमओयू है और उसमें सब कुछ साफ लिखा है। मुझे तो लगता है कि इसी एमओयू को पेनड्राइव में डाल कर सुप्रीम कोर्ट के कंप्यूटर में लगा दिया गया होगा क्योंकि दोनों की भाषा भी एक जैसी है। एटॉर्नी जनरल गुलाम वाहनवती ने भी खेल किया है।

प्रभु- जब मैं इंडियन एक्सप्रेस में था तो वाहनवती हमारा वकील होता था। नुस्ली वाडिया उसे ले कर आया था। मेरा अच्छा दोस्त है मगर आज की तारीख में अनिल अंबानी का आदमी है। यह बात मुकेश को बता देना और कह देना कि मैंने बताई है। हंसराज भारद्वाज ने तो उसे कभी पसंद नहीं किया। जब अनिल का पावर प्लांट ही शुरू नहीं हुआ तो उसे गैस का क्या करना है? मगर मुकेश भी क्या करेगा? मुकेश भी किसी और को गैस नहीं बेच सकता। आनंद जैन था उसे हटा दिया गया। मनोज मोदी प्रोफेशनल हैं।

नीरा- प्रभु आनंद जैन आज भी वहीं हैं मगर आज भी इस मामले में मनोज मोदी ज्यादा काम कर रहा है।

प्रभु- अनिल ने फिर से सुप्रीम कोर्ट में रिट डाली है और उसे यह करना भी चाहिए। मगर मुकेश से कहना कि जो हो रहा है वह गलत हो रहा है। जो तरीके वो अपना रहा है वो गलत है। जिन पर भरोसा कर रहा है वे गड़बड़ हैं। लंदन मैं बैठ कर दिल्ली की दलाली होती है। वैसे दिल्ली में राजनैतिक सिस्टम भी बदल गया है। कमलनाथ फैसला करता है तो प्रणब मुखर्जी और जयराम रमेश या मोंटेक उसे टाल देते है। अनिल अंबानी डीएमके के जरिए चीफ जस्टिस को पटा रहे हैं, मुझे पता है कि मुकेश को किसको पटाना चाहिए मगर वो मुझसे बात तो करे।

नीरा- ये लंदन वाला चक्कर क्या है, तुम्हे ये कहां से पता लगता है?

प्रभु- लीगल सोर्सेज से। अनिल ने तो मेरे बेटे अंकुर चावला को यानी उसकी कंपनी को रिटेनर रखा है मगर इस मामले में मेरा बेटा नहीं हैं। अब दोनों भाइयों से मेरी दोस्ती होने का नुकसान मेरे बेटे को भुगतना पड़ रहा है।

क्या इतना कुछ सुनने के बाद भी आप प्रभु चावला को पत्रकार मानेंगे. अगर ना तो जोर से कहिए, प्रभु चावला दलाल है.

ये रहा टेप, जिसे सुनने के लिए क्लिक करें और साउंड फुल कर लें.

लेखक आलोक तोमर जाने-माने पत्रकार हैं. वे फिलवक्त सीएनईबी न्यूज चैनल से जुड़े हुए हैं और डेटलाइन इंडिया न्यूज एजेंसी के संपादक हैं.


क्‍या फ्रीलांसर गधा होता है!

मुझे ईटीवी बिहार-झारखंड के पटना ऑफिस के बारे में कुछ कहना है. मैं एक ग्रॉफिक डिज़ाइनर हूँ. मैंने ईटीवी हैदराबाद में 4 साल काम किया. 2008 में मैंने यह जॉब छोड़ दिया. 2 महीने पहले मैंने ईटीवी बिहार/झारखंड के पटना ऑफिस में फ्रीलांस के तौर पर ज्वाइन किया. यहाँ आने पर मुझे यहाँ की राजनीति से दो-चार होना पड़ा. एक तो यह ऑफिस फ्रीलांसर के भरोसे ही चल रहा है. इनके पास रोज ग्रॉफिक्स का काम तो होता है पर यहाँ ग्रॉफिक डिज़ाइनर का पोस्ट नही है. यह इसलिए की उपर से आदेश नही है.

यहाँ रिसेप्‍शनिस्‍ट की पोस्ट और ऑफिस ब्‍याय की पोस्ट है. जिनको क्या करना होता है सबको पता है. जिसको हैदराबाद से एप्रूव किया गया है. इस पर विडंबना यह है कि यहाँ ग्रॉफिक डिज़ाइनर के साथ चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी की तरह व्यवहार किया जाता है. उसे पैसे तो फिक्स्ड मिलते हैं पर उनसे समय अनलिमिटेड माँगा जाता है. ऐसा नही करने पर उन्हे तरह-तरह से परेशान किया जाता है. जब मैने इस बारे में यहाँ के मैनेजर से बात की तो उन्होंने मुझसे यह कहा कि तुम्हें जितना समय देने को बोला जाए उतना समय देना ही होगा. चाहे तुम्हें रात भर रुकना पड़े. इसके बदले में तुम्हें कोई एक्स्‍ट्रा बेनेफिट नही दिया जायगा, वो चाहे पैसे हो या कंपंसेटरी ऑफ. इसके अलावा यहाँ के प्रोग्रामिंग के स्टाफ का व्यवहार तो बहुत ही खराब है.एक स्टाफ मिस्टर छविरंजन तो अपने आप को किसी गैंग का सरगना समझते हैं. जैसे एक अनुभवी आदमी को उनसे डरना ही होगा क्योंकि वो एक तथाकथित बड़े चैनल के प्रोग्रामिंग सेक्स्न के एंप्लाई हैं और वो आदमी एक फ्रीलांसर. उन्हें एक तो कोई टेक्निकल नालेज नही है. दूसरे उन्हें हर चीज़ इंस्टेंट चाहिए. जैसे ग्रॅफिक्स नहीं 2 मिनट नूडल्स चाहिए.

वस्तुस्थिति यह है कि मुझे ईटीवी हैदराबाद में 13000 रुपये सेलरी मिलती थी पर मुझे निजी कारण से वह जॉब मुझे छोड़नी पड़ी. यहाँ वो मुझे मात्र 10000 ही दे रहे थे. वो भी मुझे ज्‍वाइन करने के 2 महीने बाद तक नहीं मिले. मुझे पैसे जॉब छोड़ने के बाद ही मिले. इसके बावजूद भी पहले तो उन्होंने मुझे जॉब पर रखा क्योंकि चुनाव नज़दीक थे और उन्हें अर्जेंटली काम चाहिए था. लेकिन जैसे ही चुनाव के 5 चरण समाप्त हो गये, उन्होंने नया ग्रॉफिक डिज़ाइनर ढूँढना शुरू कर दिया. उनकी प्लानिंग तो यह थी कि वो सारे प्रोग्राम की पैकेजिंग मुझसे करवा लें और उसके बाद मुझे हटा कर किसी और ग्रॉफिक डिज़ाइनर को रख लें, जो सिर्फ़ मेरे बनाए पैकेजिंग पर कॉपी पेस्ट कर सके और 4000 - 5000 पर काम कर ले और वो भी उनके शर्तों पर. और पटना में ऐसे लोगों की कमी भी नहीं है, जो खुद ही यहाँ का मार्केट खराब कर रहे हैं.

अगर ऐसा ही था तो यहाँ ईटीवी के लोगों को अपनी प्राथमिकता तय करनी चाहिए और तब किसी को काम पर रखना चाहिए. अगर उन्हें फ्रीलांसर ही रखना है तो उन पर वो एंप्लाई से भी बदतर कायदा क्यों लागू करते हैं. अगर उन्हें 4000 - 5000 ही देने हैं तो किसी को 10000 पर क्यों रखते है. और फ्रीलांसर क्या गधा होता है, जिससे जैसे चाहे काम लिया जाए और जैसे चाहे डंडे बरसाए जाएँ. ये लोग फ्रीलांसर से काम तो लेते हैं पर उन्हें एक्सपीरियेन्स सर्टिफिकेट भी नहीं देते हैं. जब फ्रीलांसर उनका काम एंप्लाई की तरह करते हैं तो उन्हें सर्टिफिकेट देने में क्या तकलीफ़ है. और तो और ये लोग फ्रीलांसर से उनके इनकम पर कमीशन भी लेते हैं. TDS भी गलत काटा जाता है. इन्हीं सब कारण से त्रस्‍त हो कर मैंने यह काम 18 नवंबर को छोड़ दिया. मुझे मेरा 2 महीने का चेक मेरे जॉब छोड़ने के बाद ही दिया गया.

देवाशीष सिन्‍हा

ग्रॉफिक डिजाइनर

पत्रकारिता की शोषणगाथा

पत्रकारिता में शोषण का गणित समझना आसान नहीं है, क्योंकि यहाँ रिपोर्टर को थोडा सा पैसा देकर समाचार-पत्र हजारों-लाखों की कमाई करता है, वो भी बड़े तरीके से. पूंजीवाद के शोषण का तंत्र बहुत ही संगठित और दिमागी शतरंजी चाल में चतुर तंत्र है. इस चतुर तंत्र के शोषण का आधार है असंगठित और सस्ता मानवीय श्रम, जिसके कामों का सहारा लेकर चंद चतुर लोगों का यह तंत्र करोड़ों कमाता है और ऐश की जिंदगी जीता है. भारत में हिन्दी पत्रकारिता के व्यापार क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहे एक समाचार-पत्र में हो रहे शोषण के तरीके का ज़िक्र करना चाहूँगा. यह समाचार-पत्र अपने साथ एक टेब्लायडनुमा अखबार अलग से देता है, जिसमें स्थानीय भ्रष्टाचार की ख़बरें संसेशनल बनाकर छापी जाती हैं. इस छोटे से टेब्लायड का यहाँ के व्यवसायी, प्रशासनिक और राजनीतिक वर्ग में काफी खौफ है. इस टेब्लायड में काम करनेवाले अधिकांश रिपोर्टरों को हर छपे रिपोर्ट के लिए दो सौ से हज़ार रूपये के आसपास दिया जाता है. अस्थाई रूप में नौकरी करनेवाले उन रिपोर्टरों से जमकर काम लिया जाता है और नौकरी छिनने के खौफ से ये रिपोर्टर दिन-रात परेशान होकर काम करने को मजबूर होते हैं.

भ्रष्ट सामाजिक वर्गों का खौफ और रिपोर्टरों के अंदर नौकरी जाने का खौफ, दोनों के इस्तेमाल से यह यह समचार-पत्र करोड़ों कमाता है. सबसे पहले रिपोर्टरों को ऐसे भ्रष्टाचार की ख़बरें जुटाने को कहा जाता है. रिपोर्टर जितनी ख़बरें जुटाकर लाता है, सबके बारे में एक-एक डिटेल्स उसे बॉस को देना पड़ता है. मसलन, रिपोर्ट में मौजूद हर व्यक्ति के नाम, मोबाइल नम्बर, घर का पता आदि-आदि. रिपोर्ट जमा करने के बाद रिपोर्टर को आगे की पैसा कमाऊ पूंजीवादी साजिशों में शामिल नहीं किया जाता. उसे अगले रिपोर्ट के काम पर लगा दिया जाता है.

आगे का असली खेल उसके बाद शुरू होता है. बॉस और उसके ऊपर के बॉसों की चतुर चौकड़ी अब उन लोगों को फोन मिलाती हैं, जिनके खिलाफ रिपोर्टें उनके पास मौजूद हैं. समाचार-पत्र में छापने का खौफ दिखाकर उन भ्रष्ट लोगों से पैसों का सौदा तय होता है. यह सौदा हजारों, लाखों या करोड़ों में भी हो सकता है. जो पैसा नहीं देता, उसकी ख़बरें छापकर पैसा देने पर मजबूर कर दिया जाता है. पैसा पाने के बाद ख़बरों को दबा दिया जाता है. रिपोर्टर तब तक अगली ख़बरों की डिटेल्स ला चुका होता है और यह खेल निरंतर चलता रहता है. इस तरह, रिपोर्टर को थोड़े से पैसे देकर समाचार-पत्र करोड़ों कमाता है.

रिपोर्टरों के शोषण के तरीके का यह मॉडल इस तरह से काम करनेवाले हर समाचार-पत्र में प्रचलित है. ऐसे अनेक तरीके हैं, जिसके बारे में जानकार पत्रकारों को लिखना चाहिए. इस शोषणगाथा को वह शोषित रिपोर्टर भी जानता है और पत्रकार बिरादरी भी, लेकिन हिंदी पत्रकारिता में आने वाले नए बच्चों को ये मालूम नहीं है. वे इस क्षेत्र में आ तो जाते हैं, लेकिन इस शोषण तंत्र में एक बार फंसने के बाद या तो जिंदगी भर छटपटाते रहते हैं या इसी शोषण तंत्र का हिस्सा बन जाते हैं या पत्रकारिता छोड़ देते हैं.

लेखक राजीव सिंह युवा पत्रकार हैं. फिलहाल पत्रकारिता के अंदर-बाहर की दुनिया को समझने की कोशिश कर रहे हैं

अब राहुल राग बंद करें कांग्रेसी और मीडिया

अब तक देश के लिए कांग्रेस महासचिव ने किया ही क्‍या है : बिहार विधान सभा सदस्यों के चुनाव परिणाम लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और कांग्रेसियों की मंशा के एकदम विपरीत ही आये हैं, लेकिन नितीश कुमार, भाजपा नेताओं व बिहार की जनता के साथ देश के अन्य भागों के लोगों को भी लगभग ऐसे ही परिणामों की आशा थी, इसीलिए लालू, पासवान व कांग्रेसियों के अलावा कोई और हतप्रभ नहीं है। चुनाव परिणामों से लालू व पासवान सबक जरूर लेंगे और अगर नहीं लेंगे, तो उनके पास कहने व करने को अब कुछ बचा नहीं है, इसलिए उनके बारे में टिप्पणी करने से अब कोई राजनीतिक लाभ या हानि नहीं है, लेकिन कांग्रेसी अब भी राहुल राग अलापना बंद नहीं करेंगे, जबकि राहुल गांधी ने बिहार में जहां-जहां चुनावी सभायें संबोधित कीं, उन विधान सभा क्षेत्रों में भी एनडीए के प्रत्याशी ही जीते हैं, जिससे साफ जाहिर है कि राहुल की कहीं कोई आंधी नहीं है। यह बात मीडिया को भी समझ लेनी चाहिए और साफ हो गया है कि मीडिया भी नेहरू-गांधी खानदान का होने के कारण ही राहुल को हाथों-हाथ लेती है, इसलिए जनता से पहले ही मीडिया ने राहुल को भविष्य का प्रधानमंत्री घोषित कर रखा है।

वर्तमान में देश के कांग्रेसी सिर्फ राहुल गांधी के महिमा मंडन में लगे हुये ही दिखते हैं। लगता है मानो कांग्रेसियों के बीच प्रतियोगिता हो रही हो और सभी राहुल गांधी की अच्छाईयों पर निबंध लिख रहे हों। शायद, इसीलिए मीडिया भी राहुल को कुछ अधिक ही भाव देता है। कोई भी न्यूज चैनल खोलो, तो पांच खबरों में से एक महत्वपूर्ण खबर राहुल गांधी की नजर आ ही जाती है और खबर भी यह होती है कि वह कहां हैं, क्यों हैं, क्या कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं या कुछ नहीं कर रहे हैं, तो क्यों नहीं कर रहे हैं। उन्हें कुछ भी जरुर करना चाहिए, क्योंकि हम उन्हें दिखाना चाहते हैं। बेबजह की खबर देख कर दर्शक कई बार ऐसा ही सोचते हैं। इसी तरह किसी भी अखबार या पत्रिका के फ्रंट पेज पर भी राहुल गांधी नजर आ ही जाते हैं। उनकी महिमा मंडन को दर्शाती हुई तीन, चार कॉलम की एक खबर ऑल एडीशन के साथ होती है, जबकि मीडिया जगत में काम करने वाले जानते हैं कि राहुल गांधी का भारतीय राजनीति में क्या योगदान है? मुझे जहां तक ध्यान है, वहां तक राहुल गांधी वर्ष 2005 में खबरों में आना शुरु हुये और वर्ष 2006 से उन्होंने रोड शो शुरु कर दिये, जो आज तक जारी हैं। इस बीच परंपरागत लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुन गये और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के पद पर आसीन कर दिये गये। इसके अलावा उनका भारतीय राजनीत में कोई और योगदान है, तो वह मुझे ठीक से याद नहीं है।

राहुल गांधी का भारतीय राजनीति में कितना अनुभव है और कितना योगदान है, वह आप सबके सामने है। इस पर चर्चा करने की बजाय कांग्रेसियों के साथ मीडिया उन्हें जबरन प्रधानमंत्री बनाने पर तुला दिख रहा है। देश के तमाम नेताओं की जेड श्रेणी या जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा हटने की खबर आती है, तो पूरे देश के अखबार या चैनल हर्ष सा व्यक्त करते दिखते हैं और सुरक्षा पर हो रहे खर्च का ब्योरा दिखा कर जनता को जागरुक करना चाहते हैं। यह अच्छी बात है, क्योंकि देश का धन ऐसे बर्बाद नहीं होना चाहिए, पर यह बात कोई नहीं कहता कि राहुल गांधी को वीवीआईपी सुरक्षा क्यों दी जा रही है? सोनियां गांधी यूपीए की आज चेयरपर्सन हैं और कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त है। उस लिहाज से केबिनेट मंत्री के स्तर की सुरक्षा देना सही है, पर उन्हें पहले से ही वीवीआईपी सुरक्षा क्यों दी जा रही है? प्रियंका गांधी बढेरा को वीवीआईपी सुरक्षा क्यों दी जाती है? क्या इसलिए कि यह सब पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी, स्वर्गीय इन्दिरा गांधी या स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू के परिजन हैं? अगर हां, तो और भी कई पूर्व प्रधानमंत्री हैं, जिनके परिजनों के पास एक गनर तक नहीं है।राहुल गांधी के परिजन आतंकियों ने मारे, इसलिए भी नहीं कह सकते, क्योंकि इस देश के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को भी गोली से ही मारा गया था, पर उनके परिजन वीवीआईपी सुरक्षा में नहीं चल रहे हैं, फिर और क्या कारण हैं? सरकार से यह जवाब मीडिया क्यों नहीं मांगता या इस पहलू को जनता के सामने क्यों नहीं लाता?

यह मुद्दे उठाने की बजाय मीडिया सिर्फ यह दिखा या लिख रहा है कि राहुल गांधी के बगैर प्रधानमंत्री बने इस देश का भला नहीं होगा और तर्क भी दे रहे हैं कि उनके कारण कांग्रेस खड़ी हो रही है, जबकि प्रकृति की यह सामान्य प्रक्रिया है कि जो शिखर पर पहुंच जाता है, वह एक दिन नीचे जरुर आता है और जो नीचे के आखिरी बिंदु को छू लेता है, वह एक दिन ऊपर उठना जरूर शुरु कर देता है। कांग्रेस भी उस शिखर पर पहुंच कर नीचे गिरी और नीचे का बिंदु छू कर पुन: ऊपर गयी। उस में राहुल गांधी का क्या योगदान है? अगर राहुल गांधी का योगदान होता तो वर्ष 2005 में उनका जादू क्यों नहीं चला? यह भी प्राकृतिक क्रिया है कि जो जितनी जल्दी ऊपर या नीचे जाता है, वह उतनी ही जल्दी नीचे या ऊपर आता है। कांग्रेस धीरे-धीरे ऊपर गयी, तो धीरे-धीरे गिरी। भाजपा अचानक उठी और अचानक ही गिर गयी। तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाये, तो भाजपा आज भी कांग्रेस से हर मुददे पर बेहतर पार्टी है, पर भाजपा के साथ फिलहाल ऐसा संयोग बन गया है कि उसमें राष्ट्रीय स्तर पर सभी समकक्ष नेता है, जो एक-दूसरे का सम्मान नहीं कर रहे हैं। सीनियर लालकृष्ण आडवाणी जिन्ना प्रकरण के बाद से बिल्कुल बेकार हो गये हैं। उन्हें भाजपा के समर्थक या वोटर्स पूरी तरह नकार चुके हैं, पर विकल्प न होने के कारण भाजपा ने उन्हें जल्दबाजी में लोकसभा चुनाव से पूर्व प्रधानमंत्री घोषित कर दिया, जिसका लाभ कांग्रेस को मिला। इसमें राहुल गांधी का क्या योगदान है?

यह बताने की या याद दिलाने की जरुरत नहीं है कि भारत में लोकतांत्रिक प्रणाली है, जहां परंपरागत तरीके से कुछ नहीं किया जा सकता। यहां जो संविधान कहता है, वही सही है, बाकी सब गलत, तो संविधान नहीं कहता कि किसी खानदान में जन्मे लोगों को वीवीआईपी सुरक्षा मुहैया कराई जाये। राहुल गांधी की जान भी, उतनी ही कीमती होनी चाहिए, जितनी आम भारतीय की। राहुल गांधी इस समय सांसद हैं, तो उनकी तुलना अन्य सांसदों से की जानी चाहिए, पर प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के समकक्ष सुरक्षा मुहैया कराने की कौन सी तुक है? यह सवाल मीडिया को प्रमुखता से उठाना चाहिए, अगर यह सब सच नहीं लिख सकते, नहीं देख सकते, तो फिर महिमा मंडन करने से भी बचना चाहिए।

राहुल गांधी के जीवन में संघर्ष की तलाश करते हैं, तो संघर्ष उनके आस-पास भी दिखाई नहीं देता। रोटी, दवा, कपड़ा और मकान के लिए जंग करते हुए, बहिन के हाथ पीले करने की चिंता लिए देश में सैकड़ों, हजारों नहीं, बल्कि लाखों युवा दिख जायेंगे, पर जिस युवा वर्ग की राजनीति करने की राहुल गांधी बात करते हैं, उसकी तरह एक बार जीवन जी कर देखें। राहुल गांधी की दिनचर्या पर एक नजर डाली जाये तो सुबह तैयार होने से पहले नाश्ता तैयार हो जाता है। कपड़े पहनने से पहले एयरकंडीशन गाड़ी स्टार्ट हो जाती है और शाम तक भ्रमण कर लोगों से दो-चार मीठे बोल, बोल कर शाम को विश्राम स्थल पर लौट आते हैं। खाना खाकर सो जाते हैं और अगले दिन उसी दिनचर्या पर फिर काम शुरु हो जाता है। इस दिनचर्या में कहां है संघर्ष, अगर है तो वह मुझे तो नहीं दिख रहा। इस समय राहुल गांधी जो कर रहे हैं वह सब जनता की नजर में भी कुछ नहीं है, पर कांग्रेसियों के साथ मीडिया इस कार्य को प्रधानमंत्री बनने जैसा महान कार्य मानता है।

राहुल गांधी को पता है कि वह देश के प्रधानमंत्री बनने के दावेदार हैं। इसलिए हो सकता है कि भारतीय राजनीति में अपना कद बढ़ाने के इरादे से, मसीहा बनने के इरादे से व मीडिया में छाये रहने के इरादे से रोड शो या गरीबों से मिलने जैसे ड्रामा कर रहे हों, यह बात इसलिए पुख्ता हो रही है, क्योंकि राहुल गांधी ने इस से ज्यादा अभी तक और कुछ किया नहीं है। इस बात पर मीडिया चर्चा नहीं करता और जिस गाड़ी में बैठ कर राहुल गांधी क्षेत्र में घूम कर चले जाते हैं, उस गाड़ी का फोटो और उस गाड़ी को चलाने वाले चालक का इंटरव्यू दिखाते/छापते हैं। यह सब करते समय प्रोफाइल का भी ध्यान नहीं रहता, इसलिए बिहार में आये चुनाव परिणामों से कांग्रेसियों के साथ मीडिया भी सबक ले और राहुल गांधी का महिमा मंडन करना छोड़े।

लेखक बी पी गौतम स्‍वतंत्र पत्रकार