Thursday, November 25, 2010

क्‍या फ्रीलांसर गधा होता है!

मुझे ईटीवी बिहार-झारखंड के पटना ऑफिस के बारे में कुछ कहना है. मैं एक ग्रॉफिक डिज़ाइनर हूँ. मैंने ईटीवी हैदराबाद में 4 साल काम किया. 2008 में मैंने यह जॉब छोड़ दिया. 2 महीने पहले मैंने ईटीवी बिहार/झारखंड के पटना ऑफिस में फ्रीलांस के तौर पर ज्वाइन किया. यहाँ आने पर मुझे यहाँ की राजनीति से दो-चार होना पड़ा. एक तो यह ऑफिस फ्रीलांसर के भरोसे ही चल रहा है. इनके पास रोज ग्रॉफिक्स का काम तो होता है पर यहाँ ग्रॉफिक डिज़ाइनर का पोस्ट नही है. यह इसलिए की उपर से आदेश नही है.

यहाँ रिसेप्‍शनिस्‍ट की पोस्ट और ऑफिस ब्‍याय की पोस्ट है. जिनको क्या करना होता है सबको पता है. जिसको हैदराबाद से एप्रूव किया गया है. इस पर विडंबना यह है कि यहाँ ग्रॉफिक डिज़ाइनर के साथ चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी की तरह व्यवहार किया जाता है. उसे पैसे तो फिक्स्ड मिलते हैं पर उनसे समय अनलिमिटेड माँगा जाता है. ऐसा नही करने पर उन्हे तरह-तरह से परेशान किया जाता है. जब मैने इस बारे में यहाँ के मैनेजर से बात की तो उन्होंने मुझसे यह कहा कि तुम्हें जितना समय देने को बोला जाए उतना समय देना ही होगा. चाहे तुम्हें रात भर रुकना पड़े. इसके बदले में तुम्हें कोई एक्स्‍ट्रा बेनेफिट नही दिया जायगा, वो चाहे पैसे हो या कंपंसेटरी ऑफ. इसके अलावा यहाँ के प्रोग्रामिंग के स्टाफ का व्यवहार तो बहुत ही खराब है.एक स्टाफ मिस्टर छविरंजन तो अपने आप को किसी गैंग का सरगना समझते हैं. जैसे एक अनुभवी आदमी को उनसे डरना ही होगा क्योंकि वो एक तथाकथित बड़े चैनल के प्रोग्रामिंग सेक्स्न के एंप्लाई हैं और वो आदमी एक फ्रीलांसर. उन्हें एक तो कोई टेक्निकल नालेज नही है. दूसरे उन्हें हर चीज़ इंस्टेंट चाहिए. जैसे ग्रॅफिक्स नहीं 2 मिनट नूडल्स चाहिए.

वस्तुस्थिति यह है कि मुझे ईटीवी हैदराबाद में 13000 रुपये सेलरी मिलती थी पर मुझे निजी कारण से वह जॉब मुझे छोड़नी पड़ी. यहाँ वो मुझे मात्र 10000 ही दे रहे थे. वो भी मुझे ज्‍वाइन करने के 2 महीने बाद तक नहीं मिले. मुझे पैसे जॉब छोड़ने के बाद ही मिले. इसके बावजूद भी पहले तो उन्होंने मुझे जॉब पर रखा क्योंकि चुनाव नज़दीक थे और उन्हें अर्जेंटली काम चाहिए था. लेकिन जैसे ही चुनाव के 5 चरण समाप्त हो गये, उन्होंने नया ग्रॉफिक डिज़ाइनर ढूँढना शुरू कर दिया. उनकी प्लानिंग तो यह थी कि वो सारे प्रोग्राम की पैकेजिंग मुझसे करवा लें और उसके बाद मुझे हटा कर किसी और ग्रॉफिक डिज़ाइनर को रख लें, जो सिर्फ़ मेरे बनाए पैकेजिंग पर कॉपी पेस्ट कर सके और 4000 - 5000 पर काम कर ले और वो भी उनके शर्तों पर. और पटना में ऐसे लोगों की कमी भी नहीं है, जो खुद ही यहाँ का मार्केट खराब कर रहे हैं.

अगर ऐसा ही था तो यहाँ ईटीवी के लोगों को अपनी प्राथमिकता तय करनी चाहिए और तब किसी को काम पर रखना चाहिए. अगर उन्हें फ्रीलांसर ही रखना है तो उन पर वो एंप्लाई से भी बदतर कायदा क्यों लागू करते हैं. अगर उन्हें 4000 - 5000 ही देने हैं तो किसी को 10000 पर क्यों रखते है. और फ्रीलांसर क्या गधा होता है, जिससे जैसे चाहे काम लिया जाए और जैसे चाहे डंडे बरसाए जाएँ. ये लोग फ्रीलांसर से काम तो लेते हैं पर उन्हें एक्सपीरियेन्स सर्टिफिकेट भी नहीं देते हैं. जब फ्रीलांसर उनका काम एंप्लाई की तरह करते हैं तो उन्हें सर्टिफिकेट देने में क्या तकलीफ़ है. और तो और ये लोग फ्रीलांसर से उनके इनकम पर कमीशन भी लेते हैं. TDS भी गलत काटा जाता है. इन्हीं सब कारण से त्रस्‍त हो कर मैंने यह काम 18 नवंबर को छोड़ दिया. मुझे मेरा 2 महीने का चेक मेरे जॉब छोड़ने के बाद ही दिया गया.

देवाशीष सिन्‍हा

ग्रॉफिक डिजाइनर

No comments:

Post a Comment